बनारस के काशी विश्वनाथ परिसर में बनी ज्ञानवापी मस्जिद का सर्वे करने वाली टीम के एडवोकेट कमिश्नर अजय कुमार मिश्रा को उनके पद से हटा दिया गया है। अजय मिश्रा को कोर्ट ने टीम का मुखिया नियुक्त किया था। उनके निर्देशन में ही टीम ने ज्ञानवापी का सर्वे किया था, जिसमें शिवलिंग मिलने का दावा किया गया था। बनारस की एक कोर्ट इस मामले की सुनवाई कर रही है।
बनारस की कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि वकील कमिश्नर की जिम्मेदारी बहुत ज्यादा होती है। उनके सहयोगी आरपी सिंह हिदायत के बावजूद मीडिया में बातें लीक कर रहे थे। उन्हें उनके पद से हटाकर विशाल सिंह को जिम्मा दिया गया है। विशाल और अजय प्रताप सिंह को दो दिनों के भीतर अपनी रिपोर्ट कोर्ट में पेश करनी होगी। मामले की अगली सुनवाई अब 18 मई को की जाएगी। कल मुस्लिम पक्ष की दलीलें सुनी जाएंगी।
कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि जब किसी को अधिवक्ता आयुक्त नियुक्त किया जाता है तो उसे लोक सेवक की तरह से काम करना होता है। लेकिन अजय मिश्रा ने अपना प्राईवेट कैमरामैन नियुक्त किया था। वो मीडिया को खबरें लीक हो रही थीं। खास बात है कि कोर्ट में ये सारे आरोप उन विशाल सिंह ने ही लगाए जिन्हें कोर्ट ने अब एडवोकेट कमिश्वर नियुक्त किया गया है।
ज्ञानवापी मामले में बनारस की कोर्ट ने मस्जिद परिसर के उस तालाब को सील करने का आदेश दिया था, जहां शिवलिंग पाया गया था। ज्ञानवापी मस्जिद सर्वे के दौरान मस्जिद के ऊपरी हिस्से में जहां नमाज पढ़ी जाती है, उसके पास वजू के स्थान पर एक छोटा तालाब है। इसमें से शिवलिंग मिलने का दावा हिंदू पक्ष कर रहा है। बनारस कोर्ट ने जिला प्रशासन को आदेश दिया था कि जिस जगह शिवलिंग मिला है, उसे सील किया जाए। कोर्ट ने यहां आवाजाही पर भी प्रतिबंध लगा दिया है।
चार दिन चले सर्वे के दौरान 13 घंटे का वीडियो फुटेज बनाया गया है। 15 सौ तस्वीरें भी मस्जिद के भीतर और बाहर की ली गई हैं। साक्ष्य के तौर पर फुटेज व फोटो रिपोर्ट में शामिल किए जाएंगे। उधर, मुस्लिम पक्ष ने हिंदू पक्ष के दावे का खंडन करते हुए शिवलिंग को फव्वारा बताया है। उनका कहना है कि वह जिला अदालत के आदेश के खिलाफ हाईकोर्ट में अपील करेंगे।
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