दिल्ली विश्वविद्यालय (DU) में इतिहास के प्रोफेसर रतन लाल को शनिवार को तीस हजारी कोर्ट में पेश किया गया। अदालत ने उन्हें जमानत दे दी है। रतन लाल पर धार्मिक मान्यताओं को आहत करने का आरोप है। कोर्ट ने अपने फैसले में माना कि 1 शख्स के आहत होने को पूरे समुदाय पर असर नहीं मान सकते। अदालत ने माना कि ज्ञानवापी मामले पर अभी तक कोई तथ्य सामने नहीं आया है। अभी सुनवाई चल रही है। ऐसे में ये जो सोशल मीडिया पर है वो गलत है।
बेल को मंजूरी देकर अदालत ने कहा कि रतन लाल को भी मामले से जुड़ी कोई चीज पोस्ट करने से बचना होगा। वो ऐसा कोई इंटरव्यू भी नहीं देंगे जिससे FIR का संबंध हो। कोर्ट ने माना कि जो पोस्ट प्रोफेसर ने की वो अनुमानों पर आधारित थीं। भारत का समाज संसार में सबसे पुराना है और वो सभी धर्मों का सम्मान करता है। रतन लाल की पोस्ट से किसी को चिढ़ तो हो सकती है लेकिन ऐसा नहीं कि दो समुदायों में ही बैर हो जाए। उन्हें फिर भी ऐसे मामलों पर टिप्पणी से बचना चाहिए था। वो जिस तरह के शख्स हैं उसमें उनका काम गलत है।
कोर्ट ने कहा कि पुलिस की चिंता जायज है। तभी उसने केस दर्ज किया। लेकिन हमें लगता है कि इस मामले में हिरासत कोई जरूरी चीज नहीं है। आरोपी अच्छी छवि का शख्स है। उसके भागने का कोई अंदेशा नहीं। लिहाजा उसे जमानत पर छोड़ा जाए। रतन लाल के खिलाफ आईपीसी की धारा 153-ए (धर्म के आधार पर विभिन्न समूहों के बीच दुश्मनी को बढ़ावा देना) और 295-ए (धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने के इरादे से किए गए दुर्भावनापूर्ण कृत्य) के तहत एक सामाजिक कार्यकर्ता की शिकायत पर मामला दर्ज किया गया था।
रतन लाल ने ज्ञानवापी मस्जिद परिसर के अंदर कथित तौर पर शिवलिंग मिलने के बाद सोशल मीडिया पर एक पोस्ट किया था। साइबर सेल ने प्रोफेसर के खिलाफ मामला दर्ज कर लिया था। शिकायत मिली थी कि उन्होंने सोशल मीडिया पोस्ट में शिवलिंग को लेकर मजाक उड़ाया था। शुक्रवार रात उन्हें मौरिस नगर से गिरफ्तार कर लिया।
मामला दर्ज होने के बाद प्रोफेसर ने प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनका उद्देश्य किसी की धार्मिक भावनाओं को आहत करने का नहीं था। इतिहासकार होने के नाते उन्होंने इसकी समीक्षा कर अपनी राय दी है। सोशल मीडिया पोस्ट के वायरल होने के बाद रतन लाल ने एक वीडियो पोस्ट करते हुए कहा था कि उन्हें ऑनलाइन कई धमकियां मिल रही हैं और उन्होंने पुलिस से सुरक्षा और मदद मांगी है।
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