सुकृता बरुआ.
किसान संगठनों के द्वारा आंदोलन समाप्त किए जाने के ऐलान के बाद शनिवार को सिंघु बॉर्डर खाली हो जाएगा। एक साल से दिल्ली की सीमाओं पर धरना दे रहे किसानों ने अपनी रवानगी की तैयारियां पूरी कर ली है। हालांकि सिंघु बॉर्डर छोड़ने की तैयारियों में जुटे कई किसान काफी भावुक भी नजर आए और बातचीत के दौरान उनकी भावनाएं बाहर भी आ गई।
पिछले साल के नवंबर महीने से ही हरियाणा से दिल्ली को जोड़ने वाली मुख्य सड़क जी टी करनाल रोड पर अस्थायी घर बनाकर धरना दे रहे किसान एक दूसरे की मदद से अपने समानों को इकट्ठा कर अपने घर जाने के लिए पूरी तरह से तैयार हैं। घर जाने की तैयारियों में जुटे पंजाब के फतेहगढ़ साहिब के रहने वाले 61 वर्षीय किसान प्रीतपाल सिंह ने कहा कि ऐसा लग रहा है कि हम एक लंबे समय के लिए अपना घर छोड़ रहे हैं।
प्रीतपाल सिंह ने कहा कि हमने इस गर्मी में अपने गांव के प्रदर्शनकारियों के लिए यह झोपड़ी बनाई थी। पहले तो हमने सोचा था कि हम इन सामानों को यहीं छोड़ देंगे लेकिन हमारे परिवारों ने कहा कि हमें ऐसा नहीं करना चाहिए। इसलिए अब हमने तय किया है कि हम इन सारे सामानों को वापस अपने गांव ले जाएंगे और वहां ऐसी ही झोपड़ी बनाएंगे। जिसमें एक साल लंबे चले आंदोलन की तस्वीर होगी ताकि हमारी युवा पीढ़ी यह देख सकेगी कि इस ऐतिहासिक आंदोलन के दौरान हमने कैसे जीत हासिल की और हमने कैसे संघर्ष किया।
प्रीतपाल सिंह की तरह की पटियाला के इच्छेवाल गांव के लोगों ने भी तीन महीने पहले लोहे और स्टील के सहारे दो घर बनाए थे। जिन्हें वे शुक्रवार को तोड़ रहे थे। 55 वर्षीय किसान जस्मेर सिंह ने कहा कि कल ही हमारे गांव से एक ट्राली आई है जो इन सारे लोहे और स्टील को गांव लेकर जाएगी और वहां गुरुद्वारे में इसको रखा जाएगा।
सिंघु बॉर्डर आंदोलन स्थल पर मुख्य स्टेज के पास करीब 200 फीट लंबा एक शेड भी बनाया गया था। जिसे मेटल की मदद से तैयार किया गया था। स्टेज के समन्वयक दीप खत्री ने बताया कि कुछ दिनों में इस शेड को हटा लिया जाएगा और इसमें लगे लोहे और धातुओं को बेचा जाएगा। बेचने के बाद मिले पैसे को किसान मोर्चा को सौंपा जाएगा।

सिंघु बॉर्डर पर जहां प्रदर्शनकारी किसानों ने अपनी रवानगी की तैयारियां पूरी कर ली है तो वहीं लंगर चलाने वाली संस्थाओं ने भी आंदोलन स्थल खाली करने के लिए अपने सामानों को पैक कर लिया है। पिछले एक साल से सिंघु बॉर्डर पर मक्के की रोटी और सरसों का साग बांट रहे सतिंदर सिंह और उनके साथियों ने भी घर जाने के लिए अपनी तैयारी कर ली है।
हालांकि वे सीधे अपने घर को रवाना नहीं होंगे और शनिवार दोपहर को वे करनाल में लंगर लगाएंगे। ताकि शनिवार सुबह 9 बजे सिंघु बॉर्डर से चलने वाले किसान दोपहर के समय करनाल में खाना खा सकें। साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि आंदोलन के दौरान उपयोग किए गए अधिकांश सामान स्थानीय गुरुद्वारे को दिया जाएगा। इसी तरह सिंघु बॉर्डर पर सबसे बड़ा लंगर चलाने वाले डेरा बाबा जगतार सिंह ने भी हरियाणा के शाहाबाद में दूसरा लंगर तैयार किया है ताकि घर वापस जा रहे किसानों के रोटी पानी का प्रबंध हो सके।
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