Friday, December 17, 2021

मुख्य चुनाव आयुक्त को बैठक के लिए बुलाना गलत, पीएम भी नहीं बुला सकते- पूर्व सीईसी ने पूछा – क्या सरकार न्यायिक सुधार पर बैठक में सीजेआई को बुला लेगी?

प्रधानमंत्री के प्रधान सचिव पीके मिश्रा के साथ मुख्य चुनाव आयुक्त की बैठक को पूर्व CECs ने भी गलत बताया है। ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ की रिपोर्ट पर कम से कम पांच पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्तों ने अपनी प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने कहा है कि इस तरह की बैठक और आदेश से चुनाव आयोग की छवि धूमिल हो सकती है।

‘द इंडियन एक्सप्रेस’ की रिपोर्ट में इस बात का जिक्र किया गया था कि चीफ इलेक्शन कमिश्नर के साथ दो अन्य सहयोगियों को पीएमओ की तरफ से बैठक के लिए बुलाया गया। वरिष्ठ अधिकारियों ने यह भी बताया था कि सीईसी सुशील चंद्र इस तरह बुलाए जाने से खुश नहीं थे। इसके बाद 16 नवंबर को एक ऑनलाइन मीटिंग हुई। इसके बाद सुशील चंद्रा और दो अन्य सहयोगी भी पीके मिश्रा के साथ अनौपचारिक बातचीत में शामिल हुए।

चुनाव आयोग को कानून मंत्रालय की तरफ से पत्र भेजा गया था और कहा गया था कि चुनावी सुधारों को लेकर कुछ आवश्यक चर्चा करनी है इसलिए बैठक में मुख्य चुनाव आयुक्त को भी शामिल होना है। चुनाव आयोग के अधिकारियों ने पत्र की भाषा पर भी ऐतराज जताया था और कहा था कि यह किसी ‘समन’ की तरह लगती है।

सरकार की तरफ से इस तरह के पत्र और सीईसी के साथ बैठक को गलत बताते हुए पूर्व सीईसी एसवाई कुरैशी ने कहा, ‘यह बर्दाश्त करने वाली बात नहीं है। क्या अगर न्यायिक सुधार को लेकर कोई चर्चा करनी होगी तो प्रधानमंत्री सीधे CJI को ही बैठक में बुला लेंगे? प्रधनमंत्री भी इस तरह से सीईसी को किसी बैठक में नहीं बुला सकते। यह उनके अधिकार क्षेत्र से बाहर है।’

क्या बोले एसवाई कुरैशी?

बता दें कि कुरैशी जुलाई 2010 से जून 2012 तक मुख्य चुनाव आयुक्त के पद पर थे। उन्होंने कहा, ‘इस तरह की बैठक से संदेह पैदा होता है। हमारे अधिकारी सारी बातें जानते हैं। वही सारे चुनावी सुधारों को लागू करते हैं। इसके लिए अधिकारियों को ट्रेनिंग भी दी जाती है। इसलिए बैठख में अधिकारियों को बुलाना चाहिए न की सीधे सीईसी को बुलावा भेज देना चाहिए।’

फरवरी 2004 से जून 2005 तक सीईसी के पद पर रहे टीएस कृष्ण मूर्ति ने कहा, ‘हम सब यही कहते हैं कि संवैधानिक गरिमा को ध्यान में रखते हुए सीईसी को सरकार के साथ ऐसी किसी बैठक में हिस्सा नहीं लेना चाहिए। अगर चर्चा की जरूरत पड़े तो सरकार को अपनी बातें लिखित में चुनाव आयोग को भेजनी चाहिए और लिखित में चुनाव आयुक्त जवाब भी दे सकते हैं।’

चुनाव आयोग के 2018 में मुखिया रहे ओ रावत ने कहा, ‘जब मैं उस पद पर था तो ऐसा कभी नहीं हुआ। किसी मंत्रालय ने इस तरह से बैठक में शामिल होने के लिए पत्र नहीं लिखा। किसी भी सरकारी अधिकारी की अध्यक्षता में ऐसी कोई बैठक नहीं हुई जिसमें सीईसी को भी शामिल होना पड़ा हो। तीनों आयुक्तों ने औपचारिक बैठक में शामिल न होकर संवैधानिक गरिमा का ध्यान रखा है। लेकिन अलग से बातचीत करना भी दिखाता है कि वे किसी को नाराज नहीं करना चाहते थे।’

एक अन्य पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त ने कहा कि बहुत जल्द पांच राज्यों में चुनाव होने जा रहे हैं। ऐसे में अगर सरकार मुख्य चुनाव आयुक्त को बैठक में बुला लेगी तो सवाल उठेंगे। अगर सरकार को सुधारों को लेकर भी बात करनी थी तो नियमों के तहत चर्चा करनी चाहिए थी।

पूर्व सीईसी एन गोपालस्वामी ने कहा, ‘मुझे नहीं लगता इसमें कोई दिक्कत है। अगर पीके मिश्रा की औपचारिक बैठक खत्म हो गई थी औऱ बाद में तीनों आयुक्तों ने चर्चा की तो उन्हें अपनी बात रखने से कोई रोक नहीं सकता। जब औपचारिक बैठक खत्म हो गई तो कोई भी उस बैठक की अध्यक्षता नहीं कर रहा था। ये केवल आपस में एक बातचीत ही थी।’

बता दें कि पत्र मिलने के बाद सीईसी चंद्रा की प्रतिक्रिया तो नहीं मिल पाई थी लेकिन अन्य अधिकारियों ने कहा था कि इस तरह के पत्र से वे खुश नहीं हैं। बैठक में मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य दो सहयोगी शामिल नहीं हुए थे लेकिन बाद में एक औपचारिक चर्चा के लिए वे वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से जुड़े थे।

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