देश में जन्म के समय के लिंगानुपात में सुधार देखा गया है। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (एनएफएचएस-5) के मुताबिक देश में एक हजार लड़कों के जन्म के मुकाबले 929 लड़कियों का जन्म हो रहा है। पिछले सर्वेक्षण, जो 2015-16 में हुआ था, के मुताबिक एक हजार लड़कों के जन्म के मुकाबले 919 लड़कियों का जन्म हो रहा था। दूसरी ओर, देश में पहली बार एक हजार पुरुषों पर महिलाओं की संख्या ज्यादा हुई है। सर्वेक्षण के मुताबिक देश में एक हजार पुरुषों पर महिलाओं की संख्या 1020 है। ऐसा लिंगानुपात विकसित देशों में पाया जाता है।
सरकार ने 2019-21 एनएफएचएस-5 के चरण दो के तहत 14 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों के लिए जनसंख्या, प्रजनन और बाल स्वास्थ्य, परिवार कल्याण, पोषण और अन्य विषयों के प्रमुख संकेतकों से जुड़े तथ्य जारी किए। केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय के अधिकारियों के मुताबिक राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों के सहयोग से गर्भधारण पूर्व एवं प्रसवपूर्व निदान तकनीक अधिनियम को अच्छे तरीके से लागू करने व अन्य उपायों के माध्यम से जन्म लिंगानुपात को पहले से बेहतर किया गया है।
दूसरी ओर, बच्चों और महिलाओं में रक्ताल्पता (एनीमिया) चिंता का विषय बना हुआ है और 14 राज्यों एवं केंद्रशासित प्रदेशों में आधी से अधिक महिलाओं व बच्चों में रक्ताल्पता की समस्या बनी हुई है। चरण दो में शामिल सभी राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों और अखिल भारतीय स्तर पर एनएफएचएस -4 की तुलना में आधे से अधिक बच्चे और महिलाएं (गर्भवती महिलाओं सहित) रक्ताल्पता से पीड़ित हैं, जबकि 180 दिनों या उससे अधिक समय की गर्भवती महिलाओं द्वारा आयरन, फोलिक एसिड (आइएफए) गोलियों की मात्रा में पर्याप्त वृद्धि हुई है।
छह महीने से कम उम्र के बच्चों को विशेष रूप से स्तनपान के मामले में अखिल भारतीय स्तर पर सुधार हुआ है और 2015-16 में यह 55 फीसद था जो 2019-21 में बढ़कर 64 फीसद तक पहुंच गया। दूसरे चरण में शामिल सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में खासी प्रगति दिखी है। अखिल भारतीय स्तर पर संस्थागत जन्म दर 79 फीसद से बढ़कर 89 फीसद हो गई हैं। पुदुचेरी और तमिलनाडु में संस्थागत प्रसव 100 फीसद है। वहीं, चरण दो के 12 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में से सात राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में यह 90 फीसद से अधिक है।
इसमें कहा गया है कि संस्थागत प्रसव में वृद्धि होने के साथ ही कई राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में ‘सी-सेक्शन’ (सीजेरियन) प्रसव में भी काफी वृद्धि हुई है, खासकर निजी अस्पतालों में। वहीं, राष्ट्रीय स्तर पर 61.9 फीसद प्रसव सरकारी अस्पताल में हुए जबकि पिछले सर्वेक्षण के अनुसार 52 फीसद प्रसव सरकारी अस्पताल में हुए थे।
सर्वेक्षण के इस चरण में जिन राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों को सर्वेक्षण में शामिल किया गया, उनमें अरुणाचल प्रदेश, चंडीगढ़, छत्तीसगढ़, हरियाणा, झारखंड, मध्य प्रदेश, दिल्ली राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र, ओड़ीशा, पुदुचेरी, पंजाब, राजस्थान, तमिलनाडु, उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड शामिल हैं।
प्रजनन दर घटकर 2.0 हुई
देश में जनसंख्या की राष्ट्रीय दर में उल्लेखनीय कमी दर्ज की गई है। एनएफएचएस-5 के अनुसार भारत की कुल प्रजनन दर, प्रति महिला बच्चों की औसत संख्या राष्ट्रीय स्तर पर 2.2 से घटकर 2 हो गई है। शहरी क्षेत्रों में यह दर 1.6 और ग्रामीण क्षेत्रों में यह दर 2.1 है। देश की प्रजनन दर प्रतिस्थापन स्तर तक पहुंच गई है।
जन्म पंजीकरण बढ़ा
पांच साल से कम उम्र के बच्चों के पंजीकरण की दर में अच्छी वृद्धि हुई है। एनएफएचएस-5 के अनुसार भारत में 89.1 फीसद बच्चों का जन्म पंजीकरण होता है। इसे पहले के सर्वेक्षण के मुताबिक 79.7 फीसद बच्चों के जन्म का ही पंजीकरण होता था।
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