Sunday, December 12, 2021

किसान आंदोलन खत्म लेकिन पश्चिमी यूपी में किसानों की नाराजगी पर अखिलेश-जयंत की नजर

अगले साल की शुरुआत में यूपी में होने वाले विधानसभा चुनाव के मद्देनजर समाजवादी पार्टी और राष्ट्रीय लोक दल ने चुनावी गठबंधन किया है। बता दें यूपी चुनाव से पहले किसान आंदोलन तो स्थगित हो चुका है लेकिन विपक्षी दलों का मानना है कि किसानों के अंदर सरकार के प्रति नाराजगी है। ऐसे में सपा और आरएलडी इस नाराजगी को चुनावी फायदे के रूप में देख रही है।

किसानों के गुस्से के चलते सपा-आरएलडी खुद की अधिक संभावनाएं देख रही हैं। सूत्रों का कहना है कि अखिलेश यादव और जयंत चौधरी की पहली संयुक्त चुनावी रैली के स्वागत के बाद, दोनों सीट की साझेदारी पर काम कर रहे हैं। इसमें माना जा रहा है रालोद 40 निर्वाचन क्षेत्रों में चुनाव लड़ेगी। खबरों के मुताबिक सपा कुछ सीटों पर रालोद के चुनाव चिह्न पर अपने उम्मीदवार उतार सकती है। वहीं रालोद के उम्मीदवार अन्य सीटों पर भी सपा के चुनाव चिह्न पर चुनाव लड़ सकते हैं।

किसानों की नाराजगी का फायदा: दरअसल पश्चिमी यूपी में आरएलडी का खासा प्रभाव है। इससे अलग किसान आंदोलन, लखीमपुर खीरी हिंसा जैसे मामलों से भाजपा के खिलाफ पैदा हुई किसानों की नाराजगी को आरएलडी और सपा अपने फायदे के रूप में देख रही है।

आरएलडी का प्रदर्शन: सपा के आगे रालोद के राजनीतिक ग्राफ की बात करें तो आरएलडी अपने पश्चिमी यूपी के गढ़ में भी सिमटती जा रही है। इसका अब तक का सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन 2002 के यूपी विधानसभा चुनाव में दिखा था, जब भाजपा के साथ मिलकर आरएलडी ने 38 सीटों में पर चुनाव लड़ा और 14 सीटों पर जीत दर्ज की थी।

हर चुनाव कम होती रही सीटें: 2017 के विधानसभा चुनावों पर गौर करें तो रालोद ने अकेले चुनाव लड़ा था और एक ही सीट जीती थी। 2002 में रालोद ने पश्चिमी यूपी में 38 सीटों में 14 जीती, 2007 में 10 सीटें, 2012 में कांग्रेस के साथ गठबंधन कर 9 सीटें जीती, वहीं 2017 में 277 सीटों पर लड़कर मात्र 1 सीट जीती। ऐसे में साफ है कि रालोद का कद चुनाव दर चुनाव सीमित हुआ है।

रालोद के प्रदर्शन को देखते हुए कहना जल्दबाजी होगी कि सपा को इस गठबंधन का कितना फायदा मिलेगा। लेकिन किसान आंदोलन और किसानों की नाराजगी के चलते जयंत चौधरी को अपनी पार्टी के बेहतर प्रदर्शन की उम्मीद है।

बता दें कि आरएलडी चौधरी अजीत सिंह के निधन के बाद पहली बार चुनावी मैदान में है। दरअसल इसी साल मई में अजीत सिंह की कोरोना की वजह से मृत्यु हो गई थी। इसके बाद पार्टी की बागडोर जयंत चौधरी के हाथों में है। ऐसे में जयंत को विश्वास है कि युवाओं का साथ इस बार उन्हें मिलेगा।

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