Tuesday, August 17, 2021

हताशा की लपटें

सर्वोच्च न्यायालय के सामने एक युवक और युवती के आत्मदाह के प्रयास ने फिर पुलिस के कामकाज पर गहरे प्रश्नचिह्न छोड़े हैं। दोनों उत्तर प्रदेश के निवासी हैं। इन्होंने पहले सर्वोच्च न्यायालय के भीतर प्रवेश करने का प्रयास किया, मगर सुरक्षा कर्मियों ने रोक दिया। फिर ये दूसरे गेट पर पहुंचे और पेट्रोल डाल कर खुद को आग लगा ली। उनके पास से मिली वस्तुओं से जाहिर है कि वे पहले से आत्मदाह करने का तय करके आए थे। खुद को आग लगाने से पहले उन्होंने फेसबुक पर सीधा प्रसारण करते हुए अपनी व्यथा भी बयान की थी। पता चला है कि लड़की ने करीब तीन साल पहले उत्तर प्रदेश के एक सांसद के खिलाफ बलात्कार का मामला दर्ज कराया था। उसके साथ आया लड़का उस मामले में गवाह था। उसी खुंदक में सांसद के इशारे पर पुलिस ने इन दोनों के खिलाफ फर्जी मामले दर्ज कर दिए। लगातार प्रताड़ित होते रहने और कहीं से भी इंसाफ न मिल पाने से हताश होकर इन दोनों ने आत्मदाह का रास्ता अख्तियार किया।

आत्मदाह का कदम आमतौर पर लोग इसलिए उठाते देखे जाते हैं कि शासन-प्रशासन का ध्यान आकर्षित कर सकें। अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं है कि ऐसे लोग प्रशासन से किस कदर नाउम्मीद होते होंगे कि न्याय पाने के लिए अपने को आग की लपटों में झोंक देना उचित समझते होंगे। उत्तर प्रदेश से जुड़ी यह कोई पहली घटना नहीं है, जब किसी ने राज्य पुलिस की प्रताड़ना, बेरुखी या फिर अपेक्षित मदद न मिलने से हताश होकर आत्मदाह का रास्ता अपनाया। अगर केवल इसी साल हुई अलग-अलग जिलों की घटनाओं पर नजर डालें, तो आगरा कोतवाली और जिलाधिकारी कार्यालय के बाहर इसी तरह एक युवक और एक महिला ने अलग-अलग आत्मदाह करने का प्रयास किया। फरवरी में उत्तर प्रदेश विधानसभा के सामने एक युवक ने अपने ऊपर मिट्टी का तेल छिड़क कर आग लगा ली। पिछले साल अक्तूबर में भी एक युवती ने विधानसभा भवन के आगे आत्मदाह करने का प्रयास किया था। ऐसी अनेक घटनाएं मिल जाएंगी। मगर सिर्फ उन्हीं घटनाओं के बारे में लोगों को पता चल पाता है, जो मीडिया में आती हैं। कई लोग ऐसी हताशा में खुदकुशी कर लेते हैं, जिनकी सूचना मीडिया तक नहीं पहुंच पाती। इस तरह जान देने का प्रयास करने वालों की आम शिकायत है- पुलिस से अपेक्षित मदद न मिल पाना, शिकायत दर्ज न करना, बेवजह परेशान करना, दोषी को संरक्षण देना आदि।

ताजा मामले में जिस युवती ने आत्मदाह की कोशिश की, वह बलात्कार पीड़िता है। उसे सुरक्षा मिलनी चाहिए थी, पर बलात्कार का आरोप चूंकि एक रसूखदार राजनेता पर है, इस मामले में पुलिस का रवैया समझा जा सकता है। बलात्कार के मामलों में आरोपियों को बचाने की पुलिस की कोशिशों के अनेक किस्से जगजाहिर हैं। उत्तर प्रदेश में ही कुलदीप सिंह सेंगर का मामला उजागर है कि किस प्रकार बलात्कार का आरोप लगाने वाली युवती, उसके परिजनों और रिश्तेदारों को मार डाला गया। ऐसे रसूख वाले लोगों के खिलाफ मामला दर्ज कराने की हिम्मत कम ही लोग जुटा पाते हैं। यह पुलिस के लिए चिंता का विषय होना चाहिए, मगर इसके उलट वह हिम्मत दिखाने वालों को प्रताड़ित करती है। कुछ दिनों पहले प्रधान न्यायाधीश ने कहा था कि हमारे देश के थाने मानवाधिकार हनन के सबसे बड़े अड््डे बन चुके हैं। सरकारें जब तक इन अड््डों को सुधारने की राजनीतिक इच्छाशक्ति नहीं दिखाएंगी, न्याय न मिल पाने से हताश लोग इसी तरह आत्मदाह और खुदकुशी को मजबूर होंगे।

The post हताशा की लपटें appeared first on Jansatta.



from राष्ट्रीय – Jansatta https://ift.tt/2UxaU6Q

No comments:

Post a Comment

Monkeypox In India: केरल में मिला मंकीपॉक्स का दूसरा केस, दुबई से पिछले हफ्ते लौटा था शख्स

monkeypox second case confirmed in kerala केरल में मंकीपॉक्स का दूसरा मामला सामने आया है। सूबे के स्वास्थ्य मंत्रालय का कहना है कि दुबई से प...