Tuesday, January 5, 2021

मति दर मति असहमति

विकास की बनावट जब से मानवीय से ज्यादा मशीनी हुई है तब से मन और जीवन के बीच से मौलिकता की संभवाना लगातार खारिज होती गई है। आलम यह है कि मौजूदा दौर में हमारा होना किसी रचनात्मक दखल में तब्दील हो, यह चुनौती और बड़ी हो गई है। दरअसल, हम बस उस ‘रुटीन’ के पिछलग्गू बनते जा रहे हैं, जो हर बारह महीने के बाद ‘गया साल, आया साल’ का कोरस गान करता रहता है।

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