आज के परिदृश्य में माता-पिता जरूरत से ज्यादा फिक्रमंद हैं। हमेशा बच्चे को अपनी नजरों के सामने रखना चाहते हैं। इस प्रकार बच्चा एक बंधन में कसा उबाऊ चक्र में घूमने को बाध्य होता है। बंधन में कैसी ‘हैप्पीनेस’ या खुशी? उसके जेहन में हमेशा मोटी-मोटी किताबें, स्कूल और कोचिंग संस्थान होते हैं, जहां से शिक्षा प्राप्त कर वह एशो-आराम का जीवन जीना चाहता है।
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