अयोध्या के महाराजा सगर के साठ हजार पुत्रों-प्रजाजनों को महर्षि कपिल के शाप से तारने के लिए रघुवंशी राजाओं ने क्रमिक तपश्चर्या की। अंतत: माता गंगा के प्रसन्न होने पर वे धरती पर अवतरित हुईं, जिससे पितरों को सद्गति प्राप्त हुई। धरती पर उतरते समय ही गंगा आशुतोष भगवान शिव की जटाओं में विराजित होकर उनका अलंकार बनीं। हिमालय जैसे विराट पहाड़ की गोद से तपते मैदानों में उतरकर देवप्रयाग में गंगा ने अपने दिव्य स्वरूप को धारणकर हरिद्वार, प्रयाग व वाराणसी होते हुए गंगासागर तक अकल्पनीय लौकिक-अलौकिक भावों को प्रकट किया।
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