गुलों में रंग भरे बाद-ए-नौबहार चले...। फैज अहमद फैज की इस मशहूर गजल को अगर कोई चाहे तो कोविडकाल में नए मन-मिजाज के साथ गुनगुना सकता है। वैसे भी फैज के शेरों में मानी की कई तहें मिलती हैं। कोरोना संकट के बीच गुलों के रंग और फैज का जिक्र इसलिए कि इस दौरान प्रकृति इस तरह धुली-खिली नजर आ रही है, जैसे पर्यावरण संकट जैसी कोई समस्या दुनिया में हो ही नहीं। पूरी आबोहवा में एक नई तरह की ताजगी महसूस हो रही है। सुबह-शाम जानी-अनजानी ऐसी पक्षियों की आवाजें हम सुन रहे हैं, जिन्हें तस्वीरों में ही निहारना मुमकिन था। एक गंभीर महामारी के बीच प्रकृति के इस खुले और खिले रूप की चर्चा कर रहे हैं प्रेम प्रकाश।
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