जब राखी, दिवाली, होली, मकर संक्रांति या ग्रीष्मकाल की छुट्टियां होतीं तो कुछ बच्चे अपने घर जाने में दिलचस्पी दिखाते। ऐसे ही कुछ बच्चों से जब मैंने बातचीत की तो कई सारी बातें सामने आर्इं। पता चला कि उन बच्चों को आश्रमशालाओं में दो वक्त का भोजन मिल जाता है जबकि घरों में वह भी मुश्किल से नसीब होता।
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